नोटिस–साक्ष्य के चक्कर में परेशान आम लोग, चुनाव आयोग की मंशा पर उठे सवाल
भदोही।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत चल रहे मतदाता सत्यापन अभियान ने आम जनता की परेशानी बढ़ा दी है। एआरओ द्वारा जारी नोटिसों में लगाए गए साक्ष्यों को “अधूरा” बताते हुए तारीख़ पर तारीख़ दी जा रही है, जिससे लोग असमंजस और आक्रोश की स्थिति में हैं।

सबसे बड़ा सवाल आधार कार्ड को लेकर खड़ा हो गया है। जिस आधार को केंद्र और राज्य सरकार ने सरकारी योजनाओं का प्रवेश द्वार बना दिया—बिना आधार के राशन नहीं, पेंशन नहीं, आवास नहीं—उसी आधार को अब निवास प्रमाण मानने से चुनाव आयोग इनकार करता दिखाई दे रहा है।

विडंबना यह है कि बैंक से लेकर आधार केंद्र तक, लोगों ने लंबी कतारें झेली, दस्तावेज़ जुटाए, तब कहीं जाकर आधार बनवाया। अब वही आधार मतदाता सत्यापन में बेकार करार दिया जा रहा है।
जनता सवाल पूछ रही है—
“जो आधार सरकार को प्रमाणित लगता है, वह चुनाव आयोग को क्यों नहीं?”
स्थिति यह है कि निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए लोग नगरपालिका, तहसील और ब्लॉक के चक्कर काट रहे हैं। कई मामलों में यह भी सामने आ रहा है कि तहसील से जारी निवास प्रमाण पत्र को भी स्थायी पते के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा, जिससे लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
काम-धंधा छोड़कर सत्यापन के लिए आने वाले आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। नोटिस में जहां आधार कार्ड को स्थायी पते के रूप में प्रस्तुत करने की बात कही गई है, वहीं व्यवहार में उसे नकारा जा रहा है—यह विरोधाभास जनता को समझ नहीं आ रहा।
इस पूरे मामले को लेकर लोगों ने जिलाधिकारी, भदोही से गुहार लगाई है और साथ ही चुनाव आयोग से अपील की है कि
आधार कार्ड को निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाए,
अन्यथा बड़ी संख्या में नागरिक कभी मतदाता सूची में जुड़ ही नहीं पाएंगे।
लोकतंत्र की मजबूती मतदाता से होती है, लेकिन जब मतदाता ही काग़ज़ों की भूलभुलैया में फँस जाए, तो सवाल सिर्फ़ सत्यापन का नहीं, न्याय और संवेदनशीलता का भी बन जाता है।



