“साहब! वो तो अभी खिलना शुरू ही हुई थी, कि 26 साल के उस अंधेरे ने उसकी दुनिया उजाड़ दी… आखिर कब तक सड़कों पर तमाशा बनती रहेगी हमारी बेटियों की अस्मत “
मुंबई (इंद्र यादव) ठाणे के वागले एस्टेट इलाके से आई हालिया घटना ने एक बार फिर हमारे समाज के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया है। एक 13 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी की यह खबर केवल एक FIR का कागज़ नहीं है, बल्कि हमारे सुरक्षित होने के दावों पर एक गहरा घाव है। जब एक वयस्क पुरुष अपनी वासना के लिए एक मासूम को निशाना बनाता है, तो वह केवल एक कानून नहीं तोड़ता, बल्कि उस विश्वास को तोड़ता है जिसके दम पर कोई समाज जीवित रहता है।
क्या सार्वजनिक स्थान अब असुरक्षित हैं !
FIR के मुताबिक, घटना सार्वजनिक शौचालय और रोड नंबर 22 के पास हुई। यह सोचना भयावह है कि जिस शहर को हम ‘स्मार्ट’ और ‘आधुनिक’ बनाने का दावा करते हैं, वहाँ की सड़कें और गलियां बच्चों के लिए काल बन रही हैं। क्या प्रशासन और नगर नियोजन केवल सड़कों के चौड़ीकरण तक सीमित है! क्या अंधेरे रास्तों पर पर्याप्त रोशनी और सीसीटीवी की निगरानी इतनी मुश्किल है कि हम अपनी बेटियों को घर से बाहर निकलने देने में भी डरें!
कानून का खौफ बनाम विकृत मानसिकता !
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 74 और पॉक्सो (POCSO) जैसी सख्त धाराएं लगाई हैं। कानून निस्संदेह अब पहले से अधिक कठोर है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अपराधी के मन में इस सजा का कोई डर है? 26 साल का एक युवक, जिसे समाज का निर्माण करना चाहिए था, वह अपनी नैतिक जिम्मेदारियां भूलकर इतनी घृणित मानसिकता का शिकार कैसे हो गया! अश्लील सामग्री तक आसान पहुंच और संस्कारों का अभाव आज की युवा पीढ़ी को पतन की ओर ले जा रहा है। सजा से ज्यादा जरूरी अब यह हो गया है कि हम समाज में ‘मर्यादा’ और ‘सम्मान’ के लुप्त होते मूल्यों को वापस लाएं।
साहस को सलाम: चुप्पी तोड़ना जरूरी है !
इस दुखद घटना में एक उम्मीद की किरण पीड़ित परिवार का साहस है। हमारे समाज में अक्सर ‘बदनामी’ के डर से ऐसे मामलों को दबा दिया जाता है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। इस परिवार ने FIR दर्ज कराकर न केवल न्याय की गुहार लगाई है, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया है कि अपराधी का चेहरा बेनकाब करना शर्म की बात नहीं, बल्कि गौरव की बात है। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस परिवार के साथ खड़े हों, न कि उन्हें उपेक्षा की नजर से देखें।
सामुदायिक सतर्कता: अब आँखें मूंदना बंद करें !
वागले एस्टेट जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में कोई भी घटना छिपी नहीं रहती। फिर भी, “हमें क्या लेना-देना” वाली मानसिकता अपराधियों को सुरक्षित रास्ता देती है। पुलिस हर
गली में मौजूद नहीं हो सकती; सुरक्षा की पहली कड़ी ‘पड़ोसी’ और ‘सजग नागरिक’ ही होते हैं। जब तक हम अपने आसपास होने वाली संदिग्ध गतिविधियों पर सवाल उठाना नहीं सीखेंगे, तब तक ऐसे भेड़िये खुले आम घूमते रहेंगे।
परिणाम !
यह घटना हमें याद दिलाती है कि बेटियों को ‘गुड टच-बैड टच’ सिखाना पर्याप्त नहीं है। हमें अपने बेटों और पुरुषों को यह सिखाने की जरूरत है कि स्त्री का सम्मान और कानून का डर क्या होता है। समाज की आत्मा तभी सुरक्षित रहेगी जब हमारी बेटियां बिना किसी डर के खुली हवा में सांस ले सकेंगी।
- Mr. Indra Yadav/Correspondent- Ishan Times/indrayadaveditor@gmail.com/Open information..🙏



