मुंबई (इंद्र यादव) मुंबई की होली का इतिहास महज़ रंगों का खेल नहीं, बल्कि इस शहर के सामाजिक और सांस्कृतिक डीएनए (DNA) के बदलने की गवाही है। जिस शहर ने आर.के. स्टूडियो के आंगन में सितारों को मिट्टी में मिलते देखा हो और आज जो ‘इंस्टाग्राम रील्स’ के लिए सफेद लिबास में सलीके से रंग लगवाता है, वह बदलाव की एक लंबी दास्तान कहता है।
सामूहिक उल्लास का दौर और चॉल की संस्कृति!
90 का दशक वह दौर था जब ‘पक्का रंग’ केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि रिश्तों पर भी चढ़ता था। गिरगाँव, लालबाग और परेल की चॉलों में होली का मतलब था—निजी सीमाओं का मिट जाना। पीतल के विशाल ड्रम, जिनमें रात भर रंग घोला जाता था, केवल पानी के बर्तन नहीं बल्कि आपसी भाईचारे के प्रतीक थे। वह दौर सामूहिकता का था, जहाँ पड़ोसी का घर अपना था और ‘बुरा न मानो होली है’ का नारा हर ज़्यादती के लिए एक मासूम माफ़ी थी।
ग्लैमर का निजीकरण: जब रंगों में ‘प्राइवेसी’ आई!
जैसे-जैसे मुंबई की ज़मीन महंगी हुई और इमारतें ऊंची, होली का स्वरूप भी ‘पब्लिक’ से ‘प्राइवेट’ होता गया। 2000 के दशक ने उत्सव को चॉलों से निकालकर ऊंचे टॉवरों के क्लब हाउस और आलीशान रिजॉर्ट्स में कैद कर दिया। ‘रेन डांस’ और ‘पूल पार्टी’ ने उत्सव को आधुनिकता का तड़का तो दिया, लेकिन उस बेसाख्ता मस्ती की जगह एक बनावटी ग्लैमर ने ले ली। अब होली केवल त्योहार नहीं, बल्कि एक ‘स्टेटस सिंबल’ बन चुकी थी।
चेतना का उदय: रंग अब ज़िम्मेदार हुए !
2010 के बाद का दशक मुंबई की चेतना के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। पानी की बर्बादी और हानिकारक रसायनों के खिलाफ उठती आवाज़ों ने ‘इको-फ्रेंडली’ होली की बुनियाद रखी। मुंबईकरों ने यह साबित किया कि उत्सव मनाने के लिए प्रकृति को दांव पर लगाना ज़रूरी नहीं। फूलों की होली और प्राकृतिक रंगों का चलन केवल फैशन नहीं, बल्कि एक परिपक्व समाज की पहचान बनकर उभरा।
रील और रियलिटी: डिजिटल कैनवास पर होली!
आज की होली ‘विजुअल परफेक्शन’ की गुलाम है। 2020 के बाद, होली का पैमाना यह नहीं है कि आपने कितना मज़ा किया, बल्कि यह है कि आपकी ‘स्लो-मो’ रील कितनी वायरल हुई। सफेद कुर्ते, ऑर्गेनिक गुलाल और परफेक्ट सेल्फी बैकड्रॉप—आज की होली एक सुनियोजित ‘इवेंट’ है। हालांकि, इस डिजिटल शोर के बीच कोलीवाड़ा की पारंपरिक होली का दोबारा लोकप्रिय होना एक सुखद संकेत है। यह बताता है कि मुंबई अपनी जड़ों को भूली नहीं है, बस उन्हें नए फ्रेम में पेश करना सीख गई है।
निष्कर्ष: मुंबई की होली ने खुद को हर सांचे में ढाला है—90 के दशक की धूल भरी गलियों से लेकर आज के हाई-टेक स्टूडियो तक। गुझिया का स्वाद अब शायद ‘फ्यूजन डेसर्ट’ में बदल गया हो, लेकिन इस शहर की रूह आज भी उसी मस्ती की तलाश में है। रंग भले ही ‘वॉशेबल’ हो गए हों, लेकिन यादों की छाप आज भी गहरी है।



