मीडिया प्रभारी राजेश जायसवाल
वाराणसी।
काशी केवल एक शहर नहीं, यह जीवन की निरंतर बहती धारा है। यहां की गलियां मंत्रों की गूंज, दुकानों की आवाज़ और राह चलते संवादों से जीवंत रहती हैं। पर इन दिनों विकास की एक नई परिभाषा गढ़ी जा रही है, जिसमें काशी की वही गलियां—लक्सा, गिरजाघर, गोदौलिया—खामोशी ओढ़े खड़ी हैं। रोपवे निर्माण की ऊंची-ऊंची संरचनाओं के साये में यहां का सामाजिक और व्यापारिक जीवन ठहर-सा गया है।
इसी ठहराव के दर्द को लेकर महानगर उद्योग व्यापार समिति का एक प्रतिनिधिमंडल मंगलवार को मंडलायुक्त एस. राजलिंगम और नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल से मिला। यह मुलाकात केवल समस्याओं की सूची भर नहीं थी, बल्कि उन अनकहे दुखों की अभिव्यक्ति थी, जो महीनों से दुकानों की चौखट पर बैठकर व्यापारियों की आंखों में उतर आए हैं।
व्यापारियों ने बताया कि रोपवे निर्माण के चलते लक्सा से गिरजाघर और गोदौलिया तक की राहें बंद हैं। जिन रास्तों से कभी श्रद्धालु, ग्राहक और पर्यटक बहते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा है। बाबा विश्वनाथधाम जाने वाले तीर्थयात्री भटकते हैं, मां गंगा की आरती तक पहुंचने की लालसा अधूरी रह जाती है। दुकानों में सजे सामान धूल ओढ़ लेते हैं और रोज़गार पर टिका परिवार भविष्य की चिंता में सिमट जाता है।
बेनियाबाग, रामापुरा, लक्सा और मैदागिन से ऑटो व ई-रिक्शा के पहिए थम गए हैं। बुजुर्गों के कदम भारी हो गए हैं, महिलाओं की खरीदारी सीमित हो गई है और तीर्थयात्रियों की सहज पहुंच टूट गई है। काशी का यह प्राचीन बाजार, जो सदियों से सामाजिक मेल-जोल का केंद्र रहा है, आज असहज चुप्पी में डूबा है।
प्रतिनिधिमंडल ने सुझाव दिया कि विकास यदि संवाद के साथ चले तो उसकी गति भी सुगम हो सकती है। नगर निगम और विकास प्राधिकरण की खाली पड़ी ज़मीनों पर छोटी पार्किंग बनें, ताकि सड़कें सांस ले सकें। पर्व-त्योहारों के बाद भी खड़ी बैरिकेड्स और रेलिंग जब गलियों को संकरा करती हैं, तो लगता है जैसे उत्सव खत्म होने के बाद भी बोझ बना रह गया हो।
मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने व्यापारियों की बातों को ध्यान से सुना—शब्दों के बीच छिपे भावों को भी। उन्होंने रोपवे निर्माण अवधि में प्रतिबंधित मार्गों पर गोल्फ कार्ट चलाने का आश्वासन दिया, ताकि जीवन की गति कुछ तो लौट सके। नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने छोटी और मल्टी-स्टोरी पार्किंग तथा सुलभ शौचालयों के निर्माण की बात कही—ऐसे समाधान जो शहर को राहत की सांस दे सकें।
इस प्रतिनिधिमंडल में संरक्षक श्रीनारायण खेमका, अध्यक्ष प्रेम मिश्रा, महामंत्री अशोक जायसवाल सहित अनेक व्यापारी थे। सबकी आंखों में एक ही सवाल था—क्या विकास की राह पर चलते हुए काशी की आत्मा को बचाया जा सकेगा?
काशी सिखाती है कि विकास केवल इमारतों से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन से मापा जाता है। जब तक गलियों की रौनक लौटेगी नहीं, दुकानों पर संवाद फिर से गूंजेगा नहीं, तब तक यह शहर अधूरा ही रहेगा। शायद यही समय है जब विकास और संवेदना एक ही पथ पर चलें, ताकि काशी फिर से उसी लय में सांस ले सके, जिसमें वह सदियों से जीवित रही है।
विकास की राह पर ठहरी काशी : जब गलियां खामोश हुईं और दुकानों में गूंजी दर्द की कराह
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