मुंबई वरिष्ठ पत्रकार सीआरएस न्यूज़
मुंबई (इंद्र यादव) आज सुबह-सुबह फोन की घंटी बजी, उधर से आवाज़ आई— “मित्रों…!” मैं समझ गया, साक्षात् ‘प्रधान-सेवक’ लाइन पर हैं।
बड़े लाड़ से पूछा, “इंद्र, कैसा चल रहा है अपना देश!
मैंने भी कॉलर ऊँचा किया और गुरुजी वाले अंदाज़ में कहा, “गुरु, एकदम एक नंबर! चकाचक!
मेरी बात सुनकर साहब भावुक हो गए। बोले, “देखो इंद्र, अगर कोई भी समस्या हो तो तुरंत बताना, मैं अभी तहलका मचा दूँगा!
मैंने मन ही मन सोचा— साहब, अभी जो तहलका मचा हुआ है, जनता उसी को झेल ले वही बड़ी बात है। फिर मैंने बड़े ही विनय के साथ कहा.
“अभी तहलका रहने दीजिए महाराज। अभी तो आपके परम भक्त ही गलियों में कसीदे पढ़ रहे हैं। कह रहे हैं कि सरकार की नीति तो उस विज्ञापन जैसी हो गई है, जिसमें दिखाया ‘शुद्ध देसी घी’ जाता है, पर जब मार पड़ती है तो पता चलता है कि डंडा ‘कड़वे तेल’ में डुबोकर लाया गया था!”
साहब ने बस एक लंबी सांस ली… शायद वो अगले ‘मास्टरस्ट्रोक’ के लिए तेल गर्म करने चले गए।
दिखावा बनाम हकीकत: घी की चमक (अच्छे दिन के वादे) दिखाकर तेल की मार (महंगाई और टैक्स) का अहसास कराना।
भक्तों की दुविधा: जो समर्थक कल तक ढोल बजा रहे थे, आज वही तेल की ‘चिकनाहट’ से परेशान हैं।
तहलका का डर: जनता अब ‘तहलके’ और ‘ऐतिहासिक फैसलों’ से डरने लगी है कि कहीं एक और नया टैक्स न आ जाए।इंद्र व्यंग!



