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सिस्टम की भेंट चढ़ा मासूम: एक पिता की चीखें और दम तोड़ती स्वास्थ्य सेवाएँ!

बाराबंकी (इंद्र यादव) उत्तर प्रदेश के बहराइच से सामने आई एक तस्वीर ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है। एक पिता अपने 4 साल के मासूम बेटे के निर्जीव शरीर को सीने से चिपकाए बिलख रहा है। उसके मुंह से बस एक ही शब्द निकल रहे हैं— “तनी बोल द बेटा… हमार बच्चा!” लेकिन वह बच्चा अब कभी नहीं बोलेगा। वह उस व्यवस्था की बलि चढ़ गया जहाँ इलाज के नाम पर सिर्फ ‘रेफर’ का खेल खेला जाता है।

इलाज की आस में खत्म हुई सांसें

मिली जानकारी के अनुसार, बहराइच के इस मासूम को पिछले कई दिनों से तेज बुखार था। जिले के सरकारी अस्पतालों में जब सुधार नहीं हुआ और हालत बिगड़ने लगी, तो डॉक्टरों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए उसे लखनऊ रेफर कर दिया। एक गरीब पिता अपने बच्चे को बचाने की उम्मीद में लखनऊ के लिए निकला, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। बाराबंकी पहुँचते-पहुँचते बच्चे की सांसें थम गईं।
बाराबंकी ट्रामा सेंटर के बाहर जब पिता को अपने बच्चे की लाश के साथ विलाप करते देखा गया, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं। उस पिता का रुदन ऐसा था कि पत्थर दिल इंसान भी रो पड़े।

सरकारी दावों की खुली पोल: आखिर कब तक!

यह घटना सरकार और स्वास्थ्य विभाग के उन दावों की पोल खोलती है जिनमें ‘अंतिम व्यक्ति तक बेहतर स्वास्थ्य सेवा’ पहुँचाने की बात कही जाती है।

रेफरल का जाल: जिला अस्पतालों को करोड़ों का बजट मिलता है, लेकिन गंभीर स्थिति होते ही मरीजों को लखनऊ या बड़े शहरों की ओर धकेल दिया जाता है। क्या बहराइच जैसे जिलों में एक बच्चे के बुखार का इलाज करने की पर्याप्त सुविधाएँ आज भी नहीं हैं!
प्राइवेट अस्पतालों की चांदी: जब सरकारी तंत्र फेल होता है, तभी निजी अस्पतालों की दुकानें चमकती हैं। एक गरीब आदमी या तो सरकारी बदहाली में अपना बच्चा खो देता है या प्राइवेट अस्पतालों के कर्ज के नीचे दब जाता है।
भगवान भरोसे सिस्टम: एम्बुलेंस से लेकर इमरजेंसी सेवाओं तक, सब कुछ ‘राम भरोसे’ चल रहा है। अगर समय रहते सही इलाज मिल जाता, तो शायद वह 4 साल का मासूम आज अपने पिता की गोद में खेल रहा होता, न कि निर्जीव पड़ा होता।
एक बड़ा सवाल
सत्ता के गलियारों में बैठे जिम्मेदार लोगों को यह सोचना होगा कि बड़ी-बड़ी इमारतों और विज्ञापनों से स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं सुधरती। जब तक एक पिता को अपने बच्चे की लाश लेकर सड़क पर नहीं रोना पड़ेगा, तब तक हम खुद को विकसित नहीं कह सकते।
यह सिर्फ एक बच्चे की मौत नहीं है, यह उस भरोसे की मौत है जो एक आम नागरिक अपनी सरकार पर करता है। बाराबंकी की सड़कों पर गूंजती उस पिता की चीखें व्यवस्था से जवाब मांग रही हैं।

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