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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में उतरा मानवाधिकार आयोग, यूपी सरकार की बढ़ी मुश्किलें!

उत्तर प्रदेश (इंद्र यादव) लखनऊ: ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ उत्तर प्रदेश में दर्ज हुई एफआईआर अब एक बड़े कानूनी और मानवाधिकार विवाद में बदल गई है। इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने औपचारिक रूप से संज्ञान लेते हुए केस दर्ज कर लिया है। यह कदम यूपी सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

क्या है पूरा मामला!

हाल ही में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के विरुद्ध यूपी में एक आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया था। इस कार्रवाई को ‘डीके फाउंडेशन ऑफ फ्रीडम एंड जस्टिस’ नामक संस्था ने मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन बताते हुए आयोग का दरवाजा खटखटाया है।

याचिका के मुख्य बिंदु: सत्ता के दुरुपयोग का आरोप !

संस्था की ओर से दाखिल याचिका में बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं!
दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई: याचिका में कहा गया है कि स्वामी जी के खिलाफ दर्ज की गई FIR पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है और उन्हें परेशान करने के उद्देश्य से लिखवाई गई है।
सत्ता का दुरुपयोग: यूपी सरकार पर आरोप लगाया गया है कि उसने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हुए एक आध्यात्मिक गुरु की छवि को धूमिल करने की कोशिश की है।
DGP को बनाया पार्टी: इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार के साथ-साथ पुलिस महानिदेशक (DGP) को भी पक्षकार (पार्टी) बनाया गया है।

“किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण तरीके से पुलिसिया शक्ति का प्रयोग करना उसके मौलिक मानवाधिकारों का हनन है। हम इस मामले में जवाबदेही तय करने की मांग करते हैं।” — डीके फाउंडेशन ऑफ फ्रीडम एंड जस्टिस

शिकायतकर्ता के ‘दागदार’ इतिहास पर भी वार !

इस केस की सबसे दिलचस्प बात यह है कि मानवाधिकार आयोग को सौंपी गई याचिका में उस व्यक्ति (वादी) की पूरी हिस्ट्रीशीट भी लगा दी गई है, जिसकी शिकायत पर स्वामी जी के खिलाफ FIR हुई थी।
याचिका में वादी के आपराधिक इतिहास की प्रमाणित प्रतियां पेश की गई हैं।
तर्क दिया गया है कि एक अपराधी की शिकायत पर बिना जांच किए इतने बड़े आध्यात्मिक पद पर आसीन व्यक्ति के खिलाफ केस दर्ज करना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।
अब आगे क्या होगा!
NHRC ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य के पुलिस महानिदेशक से विस्तृत रिपोर्ट तलब करने का अनुरोध स्वीकार कर लिया है। यदि पुलिस इस FIR को सही साबित करने में विफल रहती है, तो संबंधित अधिकारियों पर कड़ी गाज गिर सकती है।

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