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होली: रंग, राग और राष्ट्र की आत्मा, होली हिन्दुस्तानियों की सामूहिक स्मृति का रंगीन अध्याय

(एक सांस्कृतिक समीक्षा – विशेष लेख) राजेश जायसवाल, जोश सच का

जब फागुन की पहली बयार सरसों के खेतों को सहलाती है, जब आम के बौर महकते हैं और कोयल की कूक किसी अनसुने गीत की तरह कानों में उतरती है—तब समझिए कि हिंदुस्तान में होली आ चुकी है।

होली केवल एक त्योहार नहीं, यह भारत की सामूहिक स्मृति का रंगीन अध्याय है। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक—हर प्रदेश इसे अपने-अपने ढंग से जीता है। कहीं ढोल की थाप है, कहीं फाग के गीत, कहीं अबीर-गुलाल, तो कहीं फूलों की वर्षा। पर मूल भाव एक ही—उल्लास, उन्मुक्तता और अपनापन।

भारत की होली की खूबसूरती उसकी विविधता में है।

ब्रजभूमि की गलियों में वृंदावन और बरसाना की लट्ठमार और फूलों की होली जहां राधा-कृष्ण की रासलीला का स्मरण कराती है, वहीं पंजाब में होला मोहल्ला वीरता का उत्सव बन जाता है।

राजस्थान में लोकगीतों की मधुर तान, बिहार और पूर्वांचल में फगुआ के ठेठ देसी बोल, महाराष्ट्र की रंगपंचमी, बंगाल की डोल यात्रा—हर जगह होली अपनी अलग छटा बिखेरती है।

यह विविधता केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह बताती है कि भारत की आत्मा कितनी रंगीन और जीवंत है।

होली की शुरुआत होलिका दहन से होती है—एक प्रतीक, जहां बुराई की अग्नि में अहंकार और अन्याय भस्म हो जाते हैं। यह कथा हमें प्रह्लाद की अटूट भक्ति और सत्य की विजय की याद दिलाती है।

अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते लोग मानो अपने भीतर की नकारात्मकताओं को भी उसी अग्नि को सौंप देते हैं। अगले दिन रंगों का उत्सव इस बात का संकेत है कि जीवन में अंततः प्रेम और विश्वास ही स्थायी रंग हैं।

ब्रज में यह उत्सव श्रीकृष्ण की रासलीला से जुड़कर भक्ति का रूप ले लेता है। रंग यहां केवल त्वचा पर नहीं लगते, वे आत्मा को छूते हैं।

होली का सबसे सुंदर पक्ष है—रिश्तों की मरम्मत।

इस दिन “बुरा न मानो, होली है” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि मन की गांठें खोलने का निमंत्रण है।

रंग जब चेहरे पर लगते हैं तो पहचान की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं—जाति, वर्ग, पद, प्रतिष्ठा सब रंगों में घुल जाते हैं। अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा—सब एक-दूसरे को गले लगाते हैं।

यह त्योहार हमें सिखाता है कि इंसानियत का रंग सबसे गाढ़ा है।

पारंपरिक होली प्राकृतिक रंगों से खेली जाती थी—टेसू के फूल, हल्दी, चंदन, गुलाब। आज जब पर्यावरण संरक्षण की बात होती है, तब हमें उसी परंपरा की ओर लौटने की आवश्यकता है।

फूलों की होली और जैविक रंगों का प्रयोग यह संदेश देता है कि उत्सव प्रकृति के साथ हो, उसके विरुद्ध नहीं।

: होली क्यों है भारत की आत्मा?

यदि भारत को एक रंग में परिभाषित करना हो, तो वह संभव नहीं—क्योंकि भारत स्वयं इंद्रधनुष है। होली उस इंद्रधनुष का उत्सव है।

यह त्योहार हमें याद दिलाता है—

कि बुराई पर अच्छाई की विजय संभव है।

कि रिश्ते टूटते नहीं, रंगों से फिर जुड़ जाते हैं।

कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही असली समृद्धि है।

और सबसे बढ़कर—प्रेम ही वह रंग है जो कभी फीका नहीं पड़ता।

होली की खूबसूरती इसी में है कि यह केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक शैली है—उदारता की, अपनत्व की, और आत्मा की स्वतंत्रता की।

जब पूरा हिंदुस्तान रंगों में भीगता है, तब लगता है मानो राष्ट्र स्वयं कह रहा हो—

“मैं विविध हूं, पर विभाजित नहीं; मैं रंगीन हूं, पर एक हूं।”

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