फरीदाबाद (इंद्र यादव) दिल्ली-NCR: एक तरफ कड़ाके की ठंड और दूसरी तरफ रसोई की बुझती आग। दिल्ली से सटे फरीदाबाद और एनसीआर के इलाकों में इन दिनों घरेलू एलपीजी सिलेंडर को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और स्थानीय लोगों के दावों ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। आरोप है कि इलाके में गैस की कृत्रिम किल्लत पैदा कर जमाखोरी और कालाबाजारी का नंगा नाच चल रहा है।
लाइन में खड़े लोग और बेबस जनता
गैस एजेंसियों के बाहर सुबह 4 बजे से ही लंबी कतारें लग रही हैं। लोगों का कहना है कि वे काम-धंधा छोड़कर घंटों लाइन में लग रहे हैं, फिर भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।
ब्लैक में ‘अंधेरगर्दी’: ₹2500 से ₹3000 का रेट
सबसे चौंकाने वाला दावा गैस की कीमत को लेकर है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि जो सिलेंडर तय सरकारी रेट पर मिलना चाहिए, उसे ब्लैक में 2500 से 3000 रुपये तक में बेचा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि अगर स्टॉक नहीं है, तो ब्लैक में देने के लिए सिलेंडर कहाँ से आ रहे हैं?
सिस्टम का ‘खेल’ या तकनीकी गड़बड़ी?
उपभोक्ताओं ने ऑनलाइन बुकिंग और डिलीवरी सिस्टम पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं:
बुकिंग ‘इनवैलिड’: कई लोगों का कहना है कि जब वे ऐप या नंबर से बुकिंग करने की कोशिश करते हैं, तो उसे ‘इनवैलिड’ (अमान्य) बता दिया जाता है।
कागजों पर डिलीवरी: कुछ ग्राहकों ने आरोप लगाया कि बुकिंग के बावजूद उन्हें मैसेज मिल रहा है कि सिलेंडर 3 दिन पहले ही डिलीवर हो चुका है, जबकि उनके घर तक कोई नहीं पहुँचा।
रजिस्टर बंद: कई एजेंसियों ने बुकिंग लेना ही बंद कर दिया है, जिससे जनता में भारी रोष है।
“आम आदमी की थाली से रोटी छीनने का यह गोरखधंधा सीधे तौर पर प्रशासन की विफलता है। जब सिलेंडर की बुकिंग ही नहीं हो रही, तो अवैध ठिकानों पर गैस कैसे पहुँच रही है”
क्या है हकीकत
जानकारों का मानना है कि यह स्थिति ‘आर्टिफिशियल स्कैरसिटी’ (बनावटी कमी) की हो सकती है। जमाखोर आने वाले समय में कीमतों के बढ़ने या सप्लाई रुकने की अफवाह फैलाकर स्टॉक दबा लेते हैं और फिर उसे मनमाने दामों पर बेचते हैं।
प्रशासन से सवाल:
क्या फरीदाबाद और NCR की खाद्य एवं आपूर्ति विभाग की टीमें सो रही हैं!
एजेंसियों के स्टॉक रजिस्टर और ऑनलाइन डेटा का मिलान क्यों नहीं किया जा रहा!
जो लोग ₹3000 में सिलेंडर बेच रहे हैं, उन पर नकेल कब कसी जाएगी!
अगर वक्त रहते इन ‘गैस माफियाओं’ पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आम जनता का गुस्सा सड़कों पर फूट सकता है। सरकार को तुरंत हस्तक्षेप कर पारदर्शी वितरण सुनिश्चित करना चाहिए।



