मुंबई (इंद्र यादव) महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए दिग्गज एग्रीगेटर कंपनियों—Ola, Uber और Rapido के बाइक टैक्सी लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। इस फैसले के बाद मुंबई, पुणे और ठाणे जैसे बड़े शहरों में बाइक टैक्सी सेवा पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। सरकार का तर्क है कि ये कंपनियाँ नियमों की अनदेखी कर रही थीं, लेकिन इस फैसले के पीछे की कड़वी सच्चाई कुछ और ही इशारा कर रही है।

नियमों की आड़ में ड्राइवरों के साथ ‘खेल’
सरकार ने लाइसेंस रद्द करने के पीछे मुख्य रूप से दो कारण बताए हैं!
इलेक्ट्रिक बनाम पेट्रोल: कंपनियों को केवल इलेक्ट्रिक बाइक चलाने की अनुमति थी, जबकि सड़कों पर धड़ल्ले से पेट्रोल गाड़ियाँ दौड़ रही थीं।
सुरक्षा मानकों की अनदेखी: पुलिस वेरिफिकेशन और महिला सुरक्षा जैसे कड़े मानदंडों को पूरा न करना।
लेकिन यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन और ये कंपनियाँ मिलकर ड्राइवरों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे? सालों से पेट्रोल बाइक पर रोजी-रोटी कमा रहे हजारों युवाओं को रातों-रात ‘अवैध’ घोषित कर दिया गया।
किराए का गणित: ड्राइवरों का दोहरा शोषण
इस पूरे विवाद में सबसे चिंताजनक पहलू आर्थिक शोषण का है। एक तरफ सरकार ने ऑटो रिक्शा के लिए न्यूनतम किराया करीब 18 रुपये तय किया है, ताकि वे अपनी आजीविका सम्मान से चला सकें। वहीं दूसरी ओर, ये मल्टीनेशनल कंपनियाँ (Ola/Uber) बाज़ार में अपनी पकड़ बनाने के लिए कार चालक ड्राइवरों को मात्र 10 से 11 रुपये प्रति किलोमीटर पर गाड़ी चलाने को मजबूर कर रही हैं।
सरकारी षड्यंत्र या प्रशासनिक विफलता
जानकारों का मानना है कि यह एक सोची-समझी नीति है। पहले इन कंपनियों को बिना किसी स्पष्ट कानून के फलने-फूलने दिया गया, और जब हजारों बेरोजगार युवा अपनी बाइक लेकर सड़कों पर उतर आए, तो अचानक ‘नियमों’ का हवाला देकर उनका रोजगार छीन लिया गया।
जीविका पर संकट: अब कहाँ जाएंगे हजारों युवा
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के निर्देश पर हुई इस कार्रवाई ने उन ड्राइवरों के सामने अंधेरा कर दिया है जो किस्तों पर बाइक लेकर अपना घर चला रहे थे।
दस्तावेजों का बहाना: कंपनियों ने समय सीमा के भीतर जरूरी कागजात जमा नहीं किए, जिसकी सजा उन गरीब ड्राइवरों को भुगतनी पड़ रही है जिनका इन कॉर्पोरेट फैसलों में कोई हाथ नहीं था।
असुरक्षित भविष्य: अचानक सेवा बंद होने से मुंबई और पुणे जैसे महंगे शहरों में रहने वाले हजारों परिवारों का चूल्हा बुझने की कगार पर है।
परिणाम
सुरक्षा और पर्यावरण के नाम पर लिया गया यह फैसला सतह पर तो सही दिखता है, लेकिन इसके पीछे ड्राइवरों के प्रति संवेदनशीलता का भारी अभाव है। अगर पेट्रोल बाइक अवैध थी, तो उसे शुरू ही क्यों होने दिया गया! और अगर कंपनियाँ कम रेट पर ड्राइवरों का खून चूस रही थीं, तो प्रशासन इतने समय तक चुप क्यों रहा!
यह केवल लाइसेंस रद्द करने का मामला नहीं है, बल्कि यह उन हजारों ‘गिग वर्कर्स’ के साथ हुए धोखे की कहानी है, जिन्हें पहले तकनीक का सपना दिखाया गया और अब नियमों की भूलभुलैया में लावारिस छोड़ दिया गया।



