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मुंबई की ‘डेडलाइन’ शुरू: 72 घंटे में बुझ जाएंगे आधे शहर के चूल्हे, क्या भूखी सोएगी मायानगरी!

मुंबई (इंद्र यादव) जो शहर कभी सोता नहीं था, आज वह अपनी रसोई ठंडी पड़ने के डर से सहमा हुआ है। मिडिल ईस्ट में ईरान और इजराइल के बीच धधकती युद्ध की ज्वाला अब सात समंदर पार मुंबई के डाइनिंग टेबल तक पहुँच गई है। यह महज एक व्यापारिक खबर नहीं, बल्कि मुंबई की लाइफलाइन यानी ‘फूड सेक्टर’ पर हुआ एक ऐसा प्रहार है जिसने शहर के 20% होटलों के शटर गिरा दिए हैं।

किचन में ‘सन्नाटा’: 20% होटल हुए लॉक

मुंबई की सड़कों पर मिलने वाली कटिंग चाय से लेकर बड़े रेस्टोरेंट्स के लजीज व्यंजनों तक, हर चीज़ पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। खाड़ी देशों से होने वाली गैस सप्लाई चेन टूटने का सीधा असर कमर्शियल एलपीजी (LPG) सिलेंडर की किल्लत के रूप में दिख रहा है।
हालत यह है कि सप्लाई न होने के कारण शहर के लगभग पांच में से एक होटल ने अपना कामकाज बंद कर दिया है। छोटे और मध्यम स्तर के ढाबे और रेस्टोरेंट्स, जिनके पास गैस का बैकअप नहीं होता, सबसे पहले इस जंग की भेंट चढ़े हैं।

AHAR का अल्टीमेटम: 72 घंटे और ‘डेडलाइन’

इंडियन होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन (AHAR) ने प्रशासन की नींद उड़ाने वाली चेतावनी दी है। एसोसिएशन का कहना है कि स्थिति हाथ से निकल रही है:
72 घंटे का संकट: यदि अगले तीन दिनों में गैस की सप्लाई सामान्य नहीं हुई, तो मुंबई के 50% होटल पूरी तरह बंद हो सकते हैं।
रोजी-रोटी पर प्रहार: यह केवल मालिकों का नुकसान नहीं है, बल्कि वेटर्स, रसोइयों और डिलीवरी बॉयज समेत लाखों परिवारों के चूल्हे बुझने का डर है।

“मुंबई का फूड सेक्टर वेंटिलेटर पर है। अगर वैश्विक तनाव का समाधान तुरंत स्थानीय स्तर पर नहीं निकाला गया, तो मायानगरी का पेट भरने वाला यह उद्योग पूरी तरह चरमरा जाएगा।” — AHAR प्रतिनिधि

जंग वहाँ, दर्द यहाँ: क्यों बिगड़े हालात!

ईरान-इजराइल संघर्ष ने वैश्विक लॉजिस्टिक्स को तहस-नहस कर दिया है। चूंकि भारत अपनी गैस और तेल की जरूरतों के लिए खाड़ी क्षेत्र पर भारी निर्भर है, वहां हो रही बमबारी और समुद्री रास्तों में रुकावट ने मुंबई के कमर्शियल सिलेंडरों की किल्लत पैदा कर दी है। होटल व्यवसायी मजबूर हैं क्योंकि वे घरेलू सिलेंडरों का उपयोग नहीं कर सकते और कमर्शियल सिलेंडर बाजार से गायब हैं।

आम आदमी की जेब पर ‘डबल अटैक’

इस संकट का सीधा असर आम मुम्बईकर पर पड़ने वाला है:
महंगाई की मार: कम सप्लाई के कारण बचे हुए होटलों में खाने के दाम आसमान छू सकते हैं।
बेरोजगारी का डर: होटलों पर ताले लटकने का मतलब है बड़े पैमाने पर छंटनी।
अर्थव्यवस्था को झटका: मुंबई के राजस्व में फूड और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर का बड़ा योगदान है, जो अब खतरे में है।

मुंबई के उपनगरों में गिरते होटलों के शटर इस बात का संकेत हैं कि आधुनिक दुनिया में सीमाएं भले ही दूर हों, लेकिन युद्ध की तपिश सबको झुलसाती है। अब सबकी नजरें सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों पर हैं कि क्या वे इस 72 घंटे की डेडलाइन से पहले मुंबई को ‘भूख’ के संकट से बचा पाएंगे!

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