मुंबई वरिष्ठ पत्रकार सीआरएस न्यूज़
मुंबई (इंद्र यादव) आज का सच यह है कि हमारे घर भरे हुए हैं, पर मन खाली हैं। हम एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ रूह से रूह का रिश्ता टूटने के लिए सिर्फ एक गलतफहमी ही काफी है। विश्वास की कांच की दीवारें इतनी कमजोर हो गई हैं कि जरा सी आहट से चटक जाती हैं। सवाल यह नहीं है कि रिश्ते टूट रहे हैं, कड़वा सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है!
किताबी ज्ञान बनाम समझदारी की कमी !
हम शिक्षा की बात करते हैं, लेकिन क्या सचमुच हम शिक्षित हो रहे हैं! अगर ऊँची डिग्रियाँ इंसान को इंसान से जोड़ना नहीं सिखा सकतीं, तो ऐसी शिक्षा का बोझ ढोने का क्या फायदा!
संवेदनाओं का मरना: शिक्षा ने हमें ‘क्या’ और ‘कैसे’ का जवाब तो दिया, पर ‘क्यों’ का नहीं। हमने गणित के सवाल तो हल कर लिए, पर रिश्तों के उलझे धागों को सुलझाना भूल गए। हमारे अंदर के भाव और संवेदनाएँ मर रही हैं।
दिखावे का रिश्ता: सोशल मीडिया पर हँसती हुई तस्वीरों के पीछे, घर के बंद कमरों में सन्नाटा है। हम स्टेटस अपडेट करने में इतने व्यस्त हैं कि अपनों की आँखों में छिपे दर्द को पढ़ने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।
दिलों को जोड़ने की जरूरत !
अब वक्त आ गया है कि हम आत्मचिंतन करें। रिश्तों की अर्थी उठाने से पहले हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा!
सुनना सीखें: बोलना आसान है, पर किसी के दर्द को बिना टोके सुनना एक कला है, जो हम खो चुके हैं।
मानवता की पाठशाला: स्कूलों में किताबी ज्ञान के साथ-साथ ईमानदारी, दया और प्रेम का पाठ पढ़ाया जाना अनिवार्य होना चाहिए।
विश्वास की जड़ें: प्यार और विश्वास को जताने में कंजूसी न करें। रिश्ते बयानों से नहीं, अहसासों से जीते जाते हैं।
यदि आज भी हम नहीं जागे, तो हमारे पास शानदार घर तो होंगे, लेकिन उन घरों में रहने वाले लोग अजनबी बनकर रह जाएंगे।
- Mr. Indra Yadav/Correspondent- Ishan Times/indrayadaveditor@gmail.com/Open information..🙏



