Homeआज की ताजा खबरक्या कागज़ की 'ताक़त' खत्म हो रही है! शोर के बीच सच...

क्या कागज़ की ‘ताक़त’ खत्म हो रही है! शोर के बीच सच की तलाश! अखबार की चुनौती!

स्वतंत्र पत्रकार सीआरएस न्यूज़ इंद्र यादव मुंबई

मुंबई (इंद्र यादव) पश्चिमी देशों से आती खबरों ने सालों पहले यह घोषणा कर दी थी कि ‘प्रिंट की मौत’ करीब है। लेकिन भारत की मिट्टी और यहाँ की भाषाई पत्रकारिता ने इस भविष्यवाणी को फिलहाल गलत साबित कर दिया है। फिर भी, आज जब हम सुबह की चाय के साथ हाथ में अखबार लेते हैं, तो एक सवाल जेहन में जरूर कौंधता है— क्या यह पन्ना सिर्फ खबर दे रहा है या कल की बीती हुई घटनाओं का दस्तावेज़ मात्र है

‘बासी’ होती खबरें और रफ़्तार का रोमांच !

डिजिटल क्रांति ने ‘न्यूज़’ की परिभाषा बदल दी है। जिस खबर को अखबार अगली सुबह ब्रेक करने का सपना देखता है, वह रात होने तक सोशल मीडिया पर ‘ट्रेंड’ होकर दम तोड़ चुकी होती है। आज की युवा पीढ़ी के लिए अखबार खबर का जरिया नहीं, बल्कि फुर्सत का एक साधन बनता जा रहा है। चुनौती यह नहीं है कि डिजिटल तेज है, चुनौती यह है कि प्रिंट अपनी ‘प्रासंगिकता’ (Relevance) कैसे बचाए रखे? जब सूचनाएं मुफ्त और तत्काल हों, तो कोई पैसे देकर 12 घंटे पुरानी खबर क्यों पढ़ेगा?

विज्ञापनों का ‘डिजिटल पलायन’ !

अखबार सिर्फ खबरों से नहीं, विज्ञापनों की स्याही से चलता है। कड़वा सच यह है कि विज्ञापनों का एक बड़ा हिस्सा अब गूगल और फेसबुक की तिजोरियों में जा रहा है। कागज़ की बढ़ती कीमतों ने अखबारों के प्रबंधन को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। यदि पाठक ‘सब्सक्रिप्शन’ की पूरी कीमत देने को तैयार नहीं है और विज्ञापन डिजिटल की ओर भाग रहे हैं, तो प्रिंट के लिए यह ‘दोहरी मार’ है।

विश्वसनीयता का संकट: ‘शोर’ बनाम ‘सच’ !

डिजिटल की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी ‘अविश्वसनीयता’ है। ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के इस दौर में जहाँ हर कोई पत्रकार है, वहां प्रिंट मीडिया के पास एक बहुत बड़ा हथियार है— एडिटोरियल फिल्टर। अखबार की ताकत उसकी सनसनी नहीं, बल्कि उसका ‘सत्यापन’ होना चाहिए। प्रिंट को अब न्यूज़ मशीन नहीं, बल्कि ‘ट्रस्ट मशीन’ बनना होगा। अगर पाठक को यह भरोसा है कि “अखबार में छपा है तो सच होगा”, तभी प्रिंट मीडिया का भविष्य सुरक्षित है।

हाइब्रिड भविष्य: रास्ता किधर है !

प्रिंट मीडिया को जीवित रहने के लिए ‘हाइपर-लोकल’ होना पड़ेगा। दिल्ली की राजनीति से ज्यादा, पाठक को अपने मोहल्ले की टूटी सड़क और पास के स्कूल की समस्या में दिलचस्पी है। साथ ही, ‘हिंग्लिश’ के बढ़ते चलन को गाली देने के बजाय, इसे स्वीकार करना होगा क्योंकि भाषा बहते पानी की तरह होती है।

परिणाम !

प्रिंट मीडिया का अंत नहीं होगा, लेकिन उसका ‘अभिजात्य’ स्वरूप जरूर बदलेगा। भविष्य ‘फिजीटल’ है—जहाँ डिजिटल रफ़्तार देगा और प्रिंट उस खबर को गहराई, विश्लेषण और साख प्रदान करेगा। भारत के गाँवों में बढ़ती साक्षरता और ‘कागज़’ के प्रति सम्मान इस उद्योग की आखिरी उम्मीद है, लेकिन उम्मीद के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठने का समय अब निकल चुका है।

  • Mr. Indra Yadav/Correspondent- Ishan Times/indrayadaveditor@gmail.com/Open information..🙏
RELATED ARTICLES
Jharkhand
clear sky
14.4 ° C
14.4 °
14.4 °
32 %
1.5kmh
0 %
Wed
30 °
Thu
32 °
Fri
34 °
Sat
32 °
Sun
35 °

Most Popular