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यूपी की थाली में परोसा गया ‘सरकारी’ ज़हर: क्या अफसरों की जेबें भरने की कीमत जनता की जान है!

उत्तर प्रदेश (इंद्र यादव) साढ़े छह करोड़ का ज़हरीला तेल ज़ब्त होना विभाग की ‘उपलब्धि’ कम और उसकी ‘नाकामी’ का स्मारक ज़्यादा है। उत्तर प्रदेश के घर-घर में जो तेल पहुँच रहा था, वह रातों-रात पैदा नहीं हुआ। मुज़फ्फरनगर से लेकर गोरखपुर तक फैक्ट्रियां महीनों से चल रही थीं, ट्रकें दौड़ रही थीं और स्टिकर बदले जा रहे थे। सवाल यह है कि खाद्य सुरक्षा विभाग (FSDA) के ज़मीनी अधिकारी उस वक्त क्या ‘गुड़’ खाकर सो रहे थे!

मिलीभगत का ‘प्रोफेशनल’ खेल!

यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि बिना स्थानीय अधिकारियों की ‘सहमति’ के एक अवैध ईंट भी नहीं रखी जा सकती, फिर इतनी बड़ी रिफाइनिंग यूनिट्स कैसे चल रही थीं!
महीनेवारी का मायाजाल: सूत्रों और जानकारों की मानें तो मिलावटखोरों और विभाग के कुछ भ्रष्ट बाबुओं व इंस्पेक्टरों के बीच ‘महीनेवारी’ (हफ्ता वसूली) का पक्का इंतज़ाम होता है। इसी “कमीशन” के बदले मिलावटखोरों को छापेमारी की खबर पहले ही मिल जाती है।
सैंपल की अदला-बदली: जब कभी दबाव में सैंपल लिए भी जाते हैं, तो लैब पहुँचने तक उन्हें ‘मैनेज’ कर लिया जाता है। क्या गारंटी है कि जो 231 सैंपल लिए गए हैं, उन्हें लैब में सही तरीके से जांचा जाएगा या फिर कागज़ों पर उन्हें ‘शुद्ध’ घोषित कर दिया जाएगा!
त्यौहारी दिखावा: होली और रमज़ान के वक्त ही यह सक्रियता क्यों! क्या साल के बाकी 10 महीने मिलावट बंद रहती है! यह “विशेष अभियान” अक्सर जनता की आंखों में धूल झोंकने और ऊपरी आदेशों की खानापूर्ति करने के लिए किया जाता है।

विभाग से सीधे सवाल (जनता की अदालत में)

निगरानी कहाँ थी! जब नेपाल से पाम ऑयल आ रहा था और मुजफ्फरनगर की यूनिट्स में केमिकल मिलाया जा रहा था, तब क्षेत्रीय खाद्य निरीक्षक क्या अपनी फाइलों में ‘सब ठीक है’ लिख रहे थे!
पुरानी फाइलों का क्या! जिन 38 कंपनियों को नोटिस दिया गया, क्या उनके यहां पहले कभी जांच नहीं हुई? अगर हुई, तो उन्हें क्लीन चिट किसने दी!
अधिकारियों पर कार्रवाई कब! तेल ज़ब्त हुआ, फैक्ट्रियां सील हुईं, लेकिन उन अधिकारियों का क्या जिनकी नाक के नीचे यह धंधा फला-फूला! क्या उन पर एफआईआर होगी या सिर्फ छोटे कर्मचारियों को सस्पेंड कर पल्ला झाड़ लिया जाएगा!

रक्षक ही जब भक्षक बन जाए…

खाद्य विभाग का काम है ‘सुरक्षा’ देना, लेकिन हकीकत यह है कि लाइसेंस बांटने से लेकर सैंपलिंग तक, हर कदम पर ‘सुविधा शुल्क’ का बोलबाला है। गोरखपुर में एक्सपायरी तेल पर नया स्टिकर लगना विभाग की इंटेलिजेंस की सबसे बड़ी विफलता है। अगर आयुक्त रोशन जैकब खुद कमान न संभालतीं और टीमों को ‘इंटर-डिस्ट्रिक्ट’ (एक जिले की टीम दूसरे जिले में) न भेजा जाता, तो शायद स्थानीय अधिकारी आज भी उन्हीं मिलावटखोरों के साथ चाय की चुस्कियां ले रहे होते।
कड़वा सच: मिलावटखोर तो सिर्फ व्यापारी हैं, असली अपराधी वो वर्दीधारी अधिकारी हैं जिन्होंने चंद सिक्कों के लिए उत्तर प्रदेश के करोड़ों नागरिकों की जान दांव पर लगा दी।

सिर्फ तेल ज़ब्त करने से काम नहीं चलेगा। जब तक उन भ्रष्ट अफसरों की संपत्तियों की जांच नहीं होगी जो इन मिलावटखोरों के ‘पार्टनर’ बने हुए हैं, तब तक प्रदेश की थाली से ज़हर खत्म नहीं होगा।

मिलावटखोरी के खिलाफ आपका ‘ब्रह्मास्त्र’!

भ्रष्ट अधिकारियों और मिलावटखोरों पर लगाम कसने के लिए इन 3 कानूनी हथियारों का उपयोग करें:
RTI (2005): विभाग से पूछें कि पिछले 6 महीनों में कितने सैंपल लिए गए और कितनों पर कार्रवाई हुई! यह डेटा अधिकारियों को जवाबदेह बनाता है।
लोकायुक्त: बड़े अधिकारियों के भ्रष्टाचार की सीधी शिकायत शपथ पत्र के साथ लोकायुक्त से करें।
हाईकोर्ट : अगर विभाग सुनवाई न करे, तो ‘रिट याचिका’ के जरिए कोर्ट से जवाब तलब करवाएं।

शिकायत के जरूरी नियम!

प्रमाण: वीडियो, ऑडियो या चैट जैसे सबूत सुरक्षित रखें।
गोपनीयता: पहचान गुप्त रखने की स्पष्ट मांग करें।
सीधा संवाद: शिकायत की कॉपी DM और प्रमुख सचिव को रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजें।
याद रखें: मिलावटखोर आपकी जेब काटता है, लेकिन भ्रष्ट अधिकारी आपके परिवार की सेहत का सौदा करता है।

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