सी आर एस न्यूज़ मीडिया प्रभारी राजेश जायसवाल
इस वर्ष होलिका दहन एवं रंगोत्सव को लेकर ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर विशेष स्थिति बनी हुई है। शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है— “प्रायः निशीथोत्तरं भद्रासमाप्तौ मुखं त्यक्त्वा भद्रायामेव हालिकादाहः” अर्थात भद्रा के मुखकाल को त्यागकर उसके पुच्छकाल में ही होलिका दहन किया जाना चाहिए।
इसी आधार पर विद्वानों ने निर्णय लिया है कि होलिका दहन 2 मार्च की रात्रि अर्धरात्रि के पश्चात भद्रा के पुच्छकाल में किया जाएगा।
अर्धरात्रि के बाद भी संभव है दहन
संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिषाचार्य प्रो. अमित शुक्ल के अनुसार, 2 मार्च की अर्धरात्रि के बाद भोर में लगभग 4:56 बजे के पश्चात भी होलिका दहन किया जा सकता है, जो शास्त्रसम्मत रहेगा।
3 मार्च को रहेगा चंद्रग्रहण
परंपरानुसार 3 मार्च को रंगोत्सव मनाया जाना चाहिए, किंतु इसी दिन सायंकाल 5:59 बजे से 6:48 बजे तक चंद्रग्रहण रहेगा। ग्रहण का सूतक काल नौ घंटे पूर्व, अर्थात प्रातः 6:20 बजे से प्रारंभ हो जाएगा।
सूतक काल में किसी प्रकार का शुभ उत्सव नहीं मनाया जाता, केवल पूजा-पाठ का विधान होता है। हालांकि शास्त्रों में सूतक के दौरान रंग खेलने का स्पष्ट निषेध नहीं बताया गया है। विद्वानों के अनुसार, सूतक में रंग खेला जा सकता है, किंतु भोजन नहीं करना चाहिए।
मोक्ष के बाद भी संभव है उत्सव
चंद्रग्रहण के मोक्ष के पश्चात स्नान-दान करके रंगोत्सव मनाया जा सकता है, परंतु रात्रि की अपेक्षा दिन में उत्सव मनाना अधिक उचित माना गया है।
4 मार्च को मनाया जाएगा रंगोत्सव
उपरोक्त सभी ज्योतिषीय तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विद्वानों द्वारा निर्णय लिया गया है कि रंगोत्सव (धुरड्डी/वसंतोत्सव) 4 मार्च को धर्मसम्मत रूप से मनाया जाएगा।
श्रद्धालुओं से अपील
धर्माचार्यों ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया है कि—
2 मार्च की रात्रि अर्धरात्रि के बाद भद्रा के पुच्छकाल में होलिका दहन करें।
3 मार्च को सूतक काल का पालन करें।
4 मार्च को विधि-विधान के साथ रंगोत्सव मनाएं।
इस प्रकार शास्त्रसम्मत समय का पालन करते हुए होली पर्व को श्रद्धा, उल्लास एवं मर्यादा के साथ मनाने की अपील की गई है।



