ग्रामीण कारीगरों की आजीविका और निर्यात बढ़ाने के लिए अहम करार
मीडिया प्रभारी सीआरएस न्यूज़ राजेश जायसवाल
नई दिल्ली।
भारत का कालीन उद्योग, जो देश के लाखों ग्रामीण बुनकरों और कारीगरों को आजीविका प्रदान करता है, वर्तमान में यूरोपीय संघ (EU) को सालाना 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निर्यात कर रहा है। इसके बावजूद, यूरोपीय बाजार में लगातार बने हुए टैरिफ (शुल्क) अवरोध भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को कमजोर कर रहे हैं।
श्रम-प्रधान और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़े इस उद्योग के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती आयात शुल्क बनी हुई है। इस मुद्दे को लेकर कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (Carpet Export Promotion Council) ने भारत–यूरोपीय संघ के बीच चल रही मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वार्ताओं में लगातार सभी कालीन उत्पादों के लिए शून्य शुल्क (Zero Duty Access) की मांग उठाई है।
जैसे-जैसे भारत–ईयू एफटीए अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, कालीन उद्योग को एक बार फिर देश के माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व से बड़ी उम्मीदें हैं कि इस समझौते में भारतीय कालीन उत्पादों को यूरोपीय बाजार में पूर्ण शून्य-शुल्क पहुंच सुनिश्चित कराई जाएगी।
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह मांग पूरी होती है, तो इससे न केवल पारंपरिक कालीन क्लस्टरों की सुरक्षा होगी, बल्कि बुनकरों और कारीगरों की आजीविका को स्थायित्व मिलेगा। साथ ही, भारतीय कालीन उद्योग की यूरोपीय बाजार में हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि संभव हो सकेगी।
कालीन उद्योग से जुड़े संगठनों का मानना है कि यह समझौता भारत की हस्तशिल्प आधारित निर्यात अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और ग्रामीण रोजगार सृजन के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।



