भारत (इंद्र यादव) आज की दुनिया में हर कोई बस भाग रहा है। किसी को बड़ी गाड़ी चाहिए, तो किसी को ऊँचा पद। इसी भागदौड़ के बीच हम यह भूल गए हैं कि असली खुशी चीज़ों को इकट्ठा करने में नहीं, बल्कि मन की शांति में है।
लालच की कोई सीमा नहीं है
आज के युवा और नौकरीपेशा लोग अक्सर एक जाल में फंस जाते हैं। जैसे ही एक सपना पूरा होता है, लालच हमें दूसरा सपना दिखा देता है। 50 हजार की नौकरी मिली तो लाख की चाहत, छोटी गाड़ी ली तो बड़ी की हवस। यह ‘और-और’ की भूख हमें कभी चैन से बैठने नहीं देती। जब हम इस भूख को मार देते हैं, तभी हमें सुकून मिलना शुरू होता है।
कॉर्पोरेट कल्चर और ‘दिखावे’ का बोझ
ऑफिस की राजनीति और सबसे आगे निकलने की होड़ ने हमें मशीन बना दिया है। हम दूसरों को प्रभावित करने के लिए वो चीज़ें खरीदते हैं जिनकी हमें ज़रूरत भी नहीं होती।
सच्चाई यह है: हम महंगे फोन और कपड़ों के लिए अपनी रातों की नींद और सेहत बेच रहे हैं।
बदलाव: जिस दिन हम यह कह देते हैं कि “मुझे किसी को इम्प्रेस करने के लिए खुद को थकाने की ज़रूरत नहीं है,” उसी दिन हमारे कंधे से एक बहुत बड़ा बोझ उतर जाता है।
‘गरीबी’ में राहत कैसे!
यहाँ ‘गरीबी’ का मतलब दाने-दाने को मोहताज होना नहीं है। इसका मतलब है—सादगी भरा जीवन। जब हम अपनी इच्छाओं को कम कर लेते हैं, तो हमारे पास जो थोड़ा बहुत है, वह भी हमें बहुत लगने लगता है। जब मन में लालच नहीं होता, तो कम पैसों में भी वैसी ही नींद आती है जैसी किसी राजा को भी न आती हो। यही वह ‘राहत’ है जिसे आज का अमीर आदमी भी तरस रहा है।
असली अमीरी क्या है!
असली अमीरी यह नहीं है कि आपके पास कितना है, बल्कि यह है कि आप कितनी चीज़ों के बिना खुशी-खुशी रह सकते हैं।
शांति: काम के बाद परिवार के साथ हंसना।
सेहत: तनाव मुक्त होकर गहरी नींद लेना।
आज़ादी: समाज के बनाए ‘सक्सेस’ के नियमों को ठुकराकर अपनी मर्जी से जीना।
निष्कर्ष
सीधी सी बात है—अगर हम अपनी ‘हवस’ (ज़्यादा पाने की ज़िद) और ‘लालच’ को काबू में कर लें, तो हमारे पास जो है, हम उसी में जन्नत पा सकते हैं। सुख बाहर की चीज़ों में नहीं, बल्कि हमारे अंदर की संतुष्टि में छिपा है।
- Indra Yadav/Correspondent- Ishan Times….🙏..✍️



