📍 भदोही से विशेष व्यंग्य रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश भदोही की शाम इन दिनों बड़ी “रोमांचक” हो चली है। फर्क बस इतना है कि यहां रोमांच ट्रैफिक जाम में फंसी गाड़ियों, झुंझलाए लोगों और पसीना बहाते पुलिसकर्मियों के बीच पैदा होता है। शहर के प्रमुख चौराहों पर हर दिन ऐसा नज़ारा देखने को मिलता है, मानो पूरा शहर ‘रेंगने’ की प्रतियोगिता में शामिल हो।
हालत ये है कि जाम हटाने की जिम्मेदारी अब योजनाओं या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता से निकलकर सीधे दरोगाओं के कंधों पर आ गई है। कई दरोगा और ट्रैफिक पुलिसकर्मी खुद सड़क पर उतरकर जाम खुलवाते नजर आते हैं—जैसे शहर नहीं, कोई आपातकालीन अभ्यास चल रहा हो।
उधर, भदोही के सांसद, विधायक और तमाम जनप्रतिनिधि शायद किसी और ही ट्रैफिक में फंसे हैं—“घोषणाओं” के ट्रैफिक में। रोज नई-नई नियुक्तियां, पदों की बारिश और संगठन की सजावट हो रही है, लेकिन शहर की सड़कों के चौड़ीकरण की बात आते ही सबकी आवाज जैसे ‘म्यूट’ हो जाती है।
शहर के चौराहों पर रसूखदारों की ‘चमचागिरी पार्किंग’ भी जाम का अहम हिस्सा बन चुकी है। जहां सड़क कम और अतिक्रमण ज्यादा दिखता है। कभी प्रशासन का बुलडोजर गरजता है, थोड़ी देर के लिए उम्मीद जगती है, फिर एक “अल्टीमेटम” आता है और सब कुछ शांत… इतना शांत कि पता ही नहीं चलता कब टूटा चबूतरा फिर से खड़ा हो गया।
जनता सवाल पूछ रही है—क्या जाम में फंसी ये जिंदगी किसी को दिखाई नहीं देती? या फिर ये मान लिया गया है कि भदोही की पहचान अब कालीन नहीं, बल्कि ‘जामीन’ (जाम वाली जमीन) से होगी?
फिलहाल, भदोही की शाम का सच यही है—
नेता व्यस्त हैं, योजनाएं कागज पर हैं,
और सड़क पर… दरोगा ही असली ‘ट्रैफिक मैनेजर’ बने हुए हैं।



