Homeआज की ताजा खबरनस्ल-ए-आदम का लहू, वर्दी का रंग नहीं, दर्द का अहसास देखिए !

नस्ल-ए-आदम का लहू, वर्दी का रंग नहीं, दर्द का अहसास देखिए !

नस्ल-ए-आदम का लहू, वर्दी का रंग नहीं, दर्द का अहसास देखिए !

भारत (इंद्र यादव) इतिहास गवाह है कि जंग कभी दो देशों के बीच नहीं, बल्कि दो सियासतों के बीच होती है। लेकिन इसकी कीमत वह सिपाही चुकाता है जो किसी खेत की मिट्टी से उठकर सरहद की धूल में मिल जाता है। जब एक सैनिक मरता है, तो सिर्फ एक ‘दुश्मन’ या ‘रक्षक’ कम नहीं होता, बल्कि एक पिता, एक बेटा और एक सुहाग उजड़ जाता है। हम जिसे आंकड़ों में ‘कैजुअलिटी’ कहते हैं, वह किसी मासूम के लिए उसकी पूरी दुनिया का ढह जाना होता है।

वर्दी के पीछे की कहानी

वर्दी चाहे किसी भी रंग की हो—चाहे वह इस पार की हो या उस पार की—उसके भीतर धड़कने वाला दिल एक जैसा ही होता है। हर सिपाही के पीछे एक बूढ़ी माँ की दुआएँ और एक नन्ही जान का इंतज़ार होता है। मखदूम ने जब पूछा था, “जाने वाले सिपाही से पूछो, वो कहाँ जा रहा है! तो वह दरअसल उस सैनिक की विवशता पर सवाल उठा रहे थे। वह सैनिक, जिसे अक्सर यह भी नहीं पता होता कि जिस ज़मीन के टुकड़े के लिए वह अपनी जान दे रहा है, वहां की सियासत उसे कल याद भी रखेगी या नहीं।

जीत का जश्न या मय्यतों का सोग

साहिर लुधियानवी ने कितनी कड़वी सच्चाई लिखी थी कि “फ़त्ह का जश्न हो कि हार का सोग, ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है।” युद्ध कभी समाधान नहीं होता। युद्ध खुद एक समस्या है। जब बम गिरते हैं, तो वे धर्म या राष्ट्रीयता देखकर नहीं फटते; वे सिर्फ ‘रूह-ए-तामीर’ (निर्माण की आत्मा) को जख्मी करते हैं। सरहद के उस पार बैठी एक बच्ची के आंसू उतने ही नमकीन और दर्दनाक होते हैं, जितने इस पार की किसी बच्ची के। दुःख का कोई भूगोल नहीं होता और न ही आंसुओं की कोई नागरिकता होती है।

असली ‘शहादत’ क्या है!

अक्सर कहा जाता है कि नौजवान शहीद होते हैं, लेकिन सच तो यह है कि व्यवस्थाएं उन्हें अपनी महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर चढ़ा देती हैं। असली शहादत तो तब होती जब वह जवान अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर एक बेहतर इंसान बनाता, न कि एक बेनाम गड्ढे में दफन होकर। हमें खुश होने की तालीम दी जाती है जब दुश्मन का कोई सिपाही गिरता है, पर क्या हम उस बच्ची की चीख सुन पाते हैं जिसके सिर से साया उठ गया!

निष्कर्ष: इंसानियत का तकाज़ा

अगर आपकी आँखों में उस पाकिस्तानी बच्ची के लिए आँसू हैं, तो यकीन मानिए आपके भीतर की ‘इंसानियत’ अभी ज़िंदा है। नफरत के इस दौर में एक दुश्मन के दुख पर तड़प उठना ही वह ‘तहजीब’ है जिसकी साहिर ने वकालत की थी। हमें जंग लड़नी ही है, तो ‘वहशत’ (दरिंदगी) से लड़ें, ‘इफ़्लास’ (गरीबी) से लड़ें और उस ‘भटकी हुई कयादत’ (नेतृत्व) से लड़ें जो मासूमों के खून से अपनी कुर्सी सींचती है।
जब तक दुनिया में सिपाही ‘जाने’ के लिए तैयार किए जाएंगे और बच्चे ‘अकेले’ रह जाएंगे, तब तक जीत का हर जश्न अधूरा है। असली जीत तब होगी जब अमन का परचम लहराएगा और किसी भी आंगन की शमा बेवजह नहीं बुझेगी।

[संदर्भ]
जंग तो खुद ही एक मसला है, जंग क्या मसलों का हल देगी!
सैनिक की उस विवशता को दिखाया है, जहाँ उसे राष्ट्रवाद के नाम पर मोहरा बना दिया जाता है।

  • Mr. Indra Yadav/Correspondent- Ishan Times/Social Media Activist – Dk Foundation of Freedom and Justice Human Rights Protection Regd. by Ministry of Corporate Affairs, Govt. of India/indrayadaveditor@gmail.com/Open information..🙏
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