मुंबई (इंद्र यादव) ठाणे, कहते हैं बचपन शरारतों का दूसरा नाम है, लेकिन महाराष्ट्र के ठाणे में एक बच्चे की यही शरारत उसके जीवन का आखिरी अध्याय साबित हुई। ठाणे के वागले एस्टेट इलाके से एक ऐसी विचलित कर देने वाली खबर सामने आई है, जिसने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि समाज और आधुनिक पेरेंटिंग पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 13 साल के एक छात्र ने अपने पिता की डांट के डर से
फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
घटना का घटनाक्रम: एक ‘कॉल’ जिसने सब बदल दिया
मृतक छात्र की पहचान रुद्र राकेश सिंह (13) के रूप में हुई है, जो मुंबई के मुलुंड स्थित एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में पढ़ता था। जानकारी के अनुसार, रुद्र स्कूल में अक्सर अपने दोस्तों के साथ शरारतें (प्रेंक) करता था। हाल ही में स्कूल प्रबंधन ने इन शरारतों को ‘अनुशासनहीनता’ मानते हुए उसके माता-पिता को तलब किया था।
मां की स्कूल विजिट: रुद्र के पिता काम के सिलसिले में शहर से बाहर थे, इसलिए शुक्रवार को उसकी मां स्कूल पहुंचीं। वहां प्रिंसिपल ने रुद्र के व्यवहार की शिकायत की।
घर पर ‘मेंटल प्रेशर’: स्कूल से लौटने के बाद मां ने रुद्र को फटकार लगाई। गुस्से में मां ने रुद्र से कह दिया कि उन्होंने उसकी सारी करतूतों की जानकारी उसके पिता को दे दी है और पिता के वापस आने पर उसे कड़ी सजा मिलेगी।
खौफ की वो रात: तीसरी मंजिल का वो कमरा
श्रीनगर पुलिस स्टेशन के अधिकारियों के अनुसार, पिता की डांट और संभावित सजा के डर ने रुद्र के मन में इस कदर घर कर लिया कि उसने खौफनाक कदम उठाने का फैसला किया। शुक्रवार रात, जब घर के अन्य सदस्य अपने कामों में व्यस्त थे, रुद्र अपने तीसरी मंजिल के अपार्टमेंट के कमरे में गया और छत के पंखे से लटक गया।
काफी देर तक कमरे से बाहर न आने पर जब दरवाजा खोला गया, तो परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। रुद्र को तुरंत एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां से उसे ठाणे सिविल अस्पताल रेफर किया गया। लेकिन अफसोस, डॉक्टरों ने उसे ‘ब्रॉट डेड’ (मृत) घोषित कर दिया।
पुलिसिया कार्रवाई और कानूनी पहलू
श्रीनगर पुलिस ने इस मामले में ‘आकस्मिक मृत्यु रिपोर्ट’ (ADR) दर्ज की है। पुलिस अधिकारी ने बताया कि शुरुआती जांच में बच्चे के पिता ने भी इस बात की पुष्टि की है कि प्रिंसिपल द्वारा बुलाए जाने और मां की डांट के बाद से बच्चा काफी सहमा हुआ था। पुलिस अब स्कूल और परिवार के अन्य सदस्यों से भी पूछताछ कर रही है ताकि घटना की तह तक पहुंचा जा सके।
विशेषज्ञों की राय: अनुशासन या आतंक!
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किशोरावस्था में बच्चों का मन कांच की तरह नाजुक होता है।
“जब हम बच्चों को ‘पिता का डर’ दिखाते हैं या उन्हें समाज/स्कूल में शर्मिंदा करते हैं, तो वे खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं। उनके लिए वह डर मौत से भी बड़ा हो जाता है।” — मनोचिकित्सक
अभिभावकों के लिए कुछ कड़वे सवाल
क्या बच्चे की एक गलती की सजा उसकी जिंदगी से बड़ी थी?
क्या हमने बच्चों के मन में ‘पिता’ की छवि एक मार्गदर्शक के बजाय एक ‘जल्लाद’ जैसी बना दी है!
क्यों एक 13 साल का बच्चा अपनी गलती सुधारने के बजाय मरना बेहतर समझता है!
यह घटना ठाणे की गलियों से निकलकर हर उस घर के दरवाजे पर दस्तक दे रही है जहाँ बच्चों को प्यार से ज्यादा डर के साये में पाला जा रहा है। रुद्र की मौत एक चेतावनी है कि संवाद की कमी कितनी जानलेवा हो सकती है।फोटो: प्रतीकात्मक!



