मीडिया प्रभारी राजेश जायसवाल पत्रकार
स्वतंत्र रावत की अभिव्यक्ति
भारतीय न्यायपालिका लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। इसकी गुणवत्ता और संवेदनशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि न्यायिक सेवा में किन नीतियों के माध्यम से योग्य प्रतिभाओं को प्रवेश दिया जा रहा है। प्रवेश-स्तरीय न्यायिक सेवा में तीन वर्ष की अनिवार्य वकालत की शर्त आज एक गंभीर नीतिगत और संवैधानिक प्रश्न बन चुकी है, जिस पर पुनर्विचार अब अनिवार्य प्रतीत होता है।
यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नियम का नहीं, बल्कि समान अवसर, लैंगिक न्याय, सामाजिक समावेशन और न्यायपालिका के भविष्य से जुड़ा हुआ है।
वास्तविकता यह है कि इस अनिवार्य शर्त का प्रभाव सभी पर समान नहीं पड़ता। इसका सबसे अधिक प्रतिकूल असर महिला विधि स्नातकों, विशेषकर बेटियों पर पड़ता है, जिन पर पारिवारिक दायित्व होते हैं। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले, आर्थिक रूप से कमजोर, अनुसूचित जाति–जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक तथा दिव्यांग अभ्यर्थी भी इस व्यवस्था में पीछे छूट जाते हैं।
तीन वर्ष की वकालत अक्सर इन वर्गों के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण न होकर आर्थिक अस्थिरता, असंगठित कार्य-संस्कृति और सामाजिक असुरक्षा का कारण बन जाती है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव निषेध) की भावना के विपरीत है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रवेश-स्तरीय न्यायिक सेवा स्वयं एक प्रशिक्षण-आधारित सेवा है। चयन के बाद न्यायिक अधिकारी राज्य न्यायिक अकादमियों और राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में व्यवस्थित, व्यावहारिक और निरंतर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। ऐसे में पूर्व-प्रवेश अनिवार्य वकालत को योग्यता की कसौटी बनाना तर्कसंगत नहीं लगता।
यदि व्यावहारिक अनुभव को महत्व देना ही है, तो इसके लिए वैकल्पिक और न्यायसंगत उपाय अपनाए जा सकते हैं—जैसे चयन में अतिरिक्त वेटेज, प्रशिक्षण अवधि में आंशिक छूट या सेवा-लाभों में अनुभव आधारित प्रोत्साहन। लेकिन इसे अनिवार्य पात्रता बनाना अनेक योग्य युवाओं के लिए न्यायिक सेवा के द्वार बंद कर देता है।
यह असमानता तब और स्पष्ट हो जाती है जब हम अन्य अखिल भारतीय सेवाओं को देखते हैं। IAS और IPS जैसी सेवाओं में 21–22 वर्ष के युवा बिना किसी पूर्व प्रशासनिक अनुभव के नियुक्त होते हैं, तो फिर न्यायिक सेवा के लिए अतिरिक्त वर्षों की बाध्यता क्यों?
संविधान दिवस 2023 पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) की आवश्यकता पर राष्ट्रीय स्तर पर जो विचार सामने आया, उसका उद्देश्य ही एक समावेशी, योग्यता-आधारित और राष्ट्रीय दृष्टि वाली न्यायपालिका का निर्माण है। अनावश्यक प्रवेश बाधाएँ इस लक्ष्य को कमजोर करती हैं।
अब समय आ गया है कि अनिवार्यता की जगह अवसर, बाधा की जगह प्रशिक्षण और असमानता की जगह संवैधानिक न्याय को प्राथमिकता दी जाए।
तीन वर्ष की अनिवार्य वकालत पर पुनर्विचार न केवल न्यायपालिका को सशक्त करेगा, बल्कि बेटियों, दिव्यांगों और वंचित वर्गों के लिए न्याय के द्वार भी वास्तव में खुले।



