मुंबई (इंद्र यादव) आजकल अखबार खोलते ही या टीवी ऑन करते ही ऐसी खबरें आम हो गई हैं जहाँ किसी ने मामूली बात पर दूसरे की जान ले ली, या किसी पुरानी रंजिश में बरसों बाद बदला लिया। समाज में ‘माफ करने’ की जगह ‘सबक सिखाने’ की भावना घर कर गई है। हर इंसान दूसरे को नीचा दिखाने या उससे अपना हिसाब चुकता करने की ताक में बैठा है।आखिर हमारे समाज में इतनी कड़वाहट और प्रतिशोध (बदला लेने की भावना) क्यों बढ़ रही है! इसका जिम्मेदार कौन है! आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।धीमा न्याय: “कानून हाथ में लेने” की मजबूरीएक बड़ी वजह हमारी न्याय व्यवस्था की सुस्ती है। जब किसी पीड़ित को लगता है कि उसे अदालत से न्याय मिलने में सालों लग जाएंगे और अपराधी खुलेआम घूमेगा, तो उसके मन में ‘खुद न्याय करने’ की इच्छा जागती है। यही वह बिंदु है जहाँ एक आम नागरिक अपराधी बनने की राह पर चल पड़ता है। लोगों का व्यवस्था से भरोसा उठना प्रतिशोध को बढ़ावा देता है।सोशल मीडिया और ‘इंस्टेंट’ गुस्साआजकल हर कोई मोबाइल में खोया है। सोशल मीडिया पर किसी ने कोई टिप्पणी की नहीं कि नीचे गालियों और धमकियों की बाढ़ आ जाती है। लोग आमने-सामने बैठकर बात करने के बजाय स्क्रीन के पीछे से एक-दूसरे पर हमला करते हैं। यह डिजिटल नफरत धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बन रही है। हम छोटी-छोटी बातों को दिल पर लेने लगे हैं और तुरंत पलटवार करना चाहते हैं।बदलती परवरिश और अहंकारपुराने समय में बुजुर्ग सिखाते थे कि “क्षमा वीरस्य भूषणम्” यानी क्षमा करना वीरों का आभूषण है। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ‘अहंकार’ बहुत बढ़ गया है। आज झुकने को कमजोरी माना जाता है। परिवारों में बच्चों को हार स्वीकार करना या अपनी गलती मानना नहीं सिखाया जा रहा। जब हर कोई खुद को श्रेष्ठ और दूसरे को गलत समझता है, तो टकराव होना तय है।फिल्मों और वेब सीरीज का प्रभावआजकल के मनोरंजन के साधनों में ‘बदला’ लेने को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर और ‘मदार्नगी’ के रूप में दिखाया जाता है। नायक वही है जो सौ लोगों को मारकर अपना बदला पूरा करे। युवा मन इन काल्पनिक कहानियों से प्रभावित होता है और उसे लगता है कि हिंसा ही किसी समस्या का आखिरी और सही समाधान है।समाज और राजनीति का बँटवारासमाज अब जातियों, धर्मों और विचारधाराओं में बुरी तरह बँट चुका है। राजनीतिक फायदे के लिए लोगों के बीच नफरत के बीज बोए जाते हैं। जब हम दूसरे को ‘इंसान’ नहीं बल्कि ‘दुश्मन’ के तौर पर देखने लगते हैं, तो प्रतिशोध की भावना अपने आप जन्म ले लेती है।हम कहाँ चूक रहे हैंसंवाद की कमी: हम अब बात नहीं करते, सीधे फैसला सुनाते हैं।सहनशीलता का खत्म होना: ट्रैफिक जाम से लेकर घर के झगड़ों तक, हमें हर जगह तुरंत नतीजा चाहिए।प्रशंसा की भूख: दूसरों को नीचा दिखाकर खुद को बड़ा साबित करने की होड़।एक जरूरी बात: बदला कभी भी समस्या का अंत नहीं होता, बल्कि यह एक अंतहीन चक्र की शुरुआत है। एक कत्ल के बदले दूसरा कत्ल सिर्फ श्मशानों की भीड़ बढ़ाता है, इंसाफ नहीं दिलाता।समाधान का रास्ताइस बढ़ती नफरत को रोकने के लिए हमें जड़ पर काम करना होगा.शिक्षा में सुधार: स्कूलों में केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा और गुस्से पर काबू पाने के तरीके सिखाए जाएं।कानून का डर: पुलिस और प्रशासन को इतना चुस्त होना होगा कि अपराधी को सजा का डर हो और आम आदमी को सुरक्षा का अहसास।संवाद की संस्कृति: पड़ोसियों और समाज के लोगों के साथ मिलकर बैठने और आपसी मतभेदों को बातचीत से सुलझाने की परंपरा को फिर से जीवित करना होगा।परिणाम: प्रतिशोध एक ऐसी आग है जो उसे भी जलाती है जिसने इसे सुलगाया है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी एक शांत और सुरक्षित समाज में रहे, तो हमें ‘बदला’ लेने की नहीं, बल्कि ‘बदलाव’ लाने की ज़रूरत है। शुरुआत खुद से और आज से ही करनी होगी।क्या आपको लगता है कि इस समस्या के लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था सबसे अधिक जिम्मेदार है, या फिर आधुनिक जीवनशैली!
बदला लेने की ज़िद—हम कहाँ जा रहे हैं! ,कितनी गहरी नफ़रत की राह
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