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ईश्वर में अनुरक्ति ही सच्ची भक्ति का स्वरूप : पन्नालाल जी

प्रतिपल समर्पण और प्रेमभाव से भरा जीवन ही वास्तविक उत्सव


भदोही, 11 जनवरी 2026।

ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के पश्चात जब भक्त और भगवान के बीच हृदय से आत्मिक संबंध स्थापित होता है, तभी वास्तविक भक्ति का आरंभ होता है। भक्ति केवल एकतरफा प्रेम नहीं, बल्कि वह अवस्था है जहां भक्त और भगवान दोनों के बीच अनुराग और समर्पण का भाव ओत–प्रोत होता है। इसी मार्ग पर चलकर मानव जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।


उक्त विचार सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के वचनों को दोहराते हुए पन्नालाल जी ने निरंकारी सत्संग भवन, रजपुरा (भदोही) के प्रांगण में आयोजित संत समागम के दौरान व्यक्त किए।


उन्होंने कहा कि यदि ईश्वर की आराधना किसी स्वार्थ या सांसारिक लाभ की पूर्ति के लिए की जाए, तो वह भक्ति नहीं कहलाती। सच्ची भक्ति वह है जिसमें मनुष्य हर पल, हर कर्म को ईश्वर की स्मृति में करते हुए जीवन व्यतीत करता है। जब ईश्वर-स्मरण मनुष्य का स्वभाव बन जाता है, तभी जीवन भक्ति से परिपूर्ण होता है।
पन्नालाल जी ने आगे कहा कि भक्त का जीवन तभी भक्ति-भाव से परिपूर्ण बनता है, जब उसके आचरण और व्यवहार से प्रेम की सुगंध प्रस्फुटित हो। सत्गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ आनंदित एवं उत्सवमय जीवन जीना ही वास्तविक भक्ति है। गुरुओं द्वारा बताए गए वचनों को सत्य मानकर जीवन में उतारना तथा हर क्षण कृतज्ञता का भाव बनाए रखना सच्चे भक्त की पहचान है।
उन्होंने यह भी कहा कि एक सच्चा भक्त अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए न केवल स्वयं के जीवन को निखारता है, बल्कि दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनकर, यथासंभव सहायता करते हुए पूरे समाज के लिए प्रेरणा और खुशियों का स्रोत बनता है।
कार्यक्रम के अंत में स्थानीय संयोजक राजेश कुमार जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इस संत समागम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की सहभागिता रही।

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