Homeआज की ताजा खबरतिलगुल घ्या, गोड गोड बोला: महाराष्ट्र की संक्रांति और सद्भाव का संदेश

तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला: महाराष्ट्र की संक्रांति और सद्भाव का संदेश

मुंबई (इंद्र यादव) भारत विविधताओं का देश है, और यहाँ हर त्योहार के पीछे एक गहरा सामाजिक और वैज्ञानिक संदेश छिपा होता है। महाराष्ट्र में ‘संक्रांत’ का पर्व केवल सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह कड़वाहट को भुलाकर रिश्तों में नई मिठास घोलने का एक अनूठा अवसर है।

मिठास का संदेश: ‘तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला’

महाराष्ट्र में संक्रांति की सबसे सुंदर परंपरा तिल-गुड़ (तिलगुल) का आदान-प्रदान है। जब लोग एक-दूसरे को तिलगुल देते हुए कहते हैं, “तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला” (तिल-गुड़ लीजिए और मीठा बोलिए), तो इसके पीछे एक बड़ा जीवन दर्शन छिपा होता है। यह संदेश देता है कि पुरानी गलतफहमियों और विवादों को त्याग कर हमें अपने व्यवहार में मधुरता लानी चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टि से भी, सर्दियों के इस मौसम में तिल और गुड़ का सेवन शरीर को आवश्यक ऊष्मा प्रदान करता है।

हल्दी-कुमकुम: स्त्री शक्ति और सामाजिक जुड़ाव

संक्रांति के अवसर पर आयोजित होने वाला ‘हल्दी-कुमकुम’ कार्यक्रम केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक मंच है। विवाहित महिलाएँ एक-दूसरे को हल्दी और कुमकुम लगाकर सौभाग्य की कामना करती हैं और उपहारों (वाण) का आदान-प्रदान करती हैं। यह परंपरा आपसी मेलजोल को बढ़ावा देती है और समाज की महिलाओं के बीच एकता और सहयोग की भावना को मजबूत करती है।

परंपराओं का अनूठा रंग: काले वस्त्र और पतंगबाज़ी

मकर संक्रांति पर काले वस्त्र पहनने की परंपरा महाराष्ट्र की एक अनूठी विशेषता है। आमतौर पर शुभ कार्यों में काले रंग से बचा जाता है, लेकिन संक्रांति पर इसे विशेष महत्व दिया गया है। चूंकि यह साल का सबसे ठंडा समय होता है, इसलिए काला रंग सूर्य की गर्मी को सोखने में मदद करता है। वहीं, खुले आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें न केवल उत्साह का प्रतीक हैं, बल्कि यह लोगों को धूप में समय बिताने के लिए प्रेरित करती हैं, जो
स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

तीन दिनों का उत्सव: प्रकृति और समाज के प्रति आभार

संक्रांति का उत्सव तीन दिनों तक चलता है, जिसमें हर दिन का अपना महत्व है!
◆ भोगी: इस दिन प्रकृति की उपज और सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
◆ संक्रांति: यह मुख्य दिन आपसी मिलन और ‘तिलगुल’ बांटने का होता है।
◆ किंक्रांत: तीसरे दिन दोस्तों और परिवार के साथ खुशियां मनाई जाती हैं और दान-पुण्य के माध्यम से सामाजिक जिम्मेदारी निभाई जाती है।

निष्कर्ष!

आज के भागदौड़ भरे जीवन और डिजिटल युग में, संक्रांति जैसे त्योहार हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं। पूरन पोली का स्वाद हो या तिल के लड्डू की मिठास, यह पर्व हमें सिखाता है कि दान और प्रेम ही समाज के असली आधार हैं। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि जिस तरह सूर्य नई ऊर्जा के साथ उत्तर की ओर बढ़ता है, हमें भी अपने अहंकार को त्याग कर प्रेम और सद्भाव की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

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