मुंबई (इंद्र यादव) नागपुर में बारूद के ढेर पर थमी 15 जिंदगीयाँ; पेट की आग बुझाते-बुझाते शरीर राख हो गए। सूरज अभी सिर पर चढ़ा ही था कि एक जोरदार धमाके ने नागपुर की शांत हवाओं में मौत का बारूद घोल दिया। नागपुर स्थित एक विस्फोटक कारखाने में हुआ यह विस्फोट इतना भीषण था कि इसकी गूँज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई। लेकिन इस धमाके की गूँज से भी ज्यादा भयानक है उन 15 परिवारों की खामोशी, जिनके कमाने वाले सदस्य आज सुबह घर से यह कहकर निकले थे कि शाम को रोटी लेकर लौटेंगे
चश्मदीदों के मुताबिक, दोपहर के वक्त जब कारखाने में काम पूरी रफ्तार पर था, अचानक एक जोरदार धमाका हुआ और देखते ही देखते पूरी इमारत मलबे के ढेर में तब्दील हो गई। आसमान में धुएं का काला गुबार छा गया और चारों ओर सिर्फ चीख-पुकार सुनाई देने लगी। 15 मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई, जिनके शवों की हालत देखकर पत्थर दिल इंसान की रूह भी कांप जाए। 18 अन्य लोग अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं।
यह सिर्फ एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं है, बल्कि उन गरीब परिवारों पर टूटा पहाड़ है जो रोजाना अपनी जान जोखिम में डालकर ‘बारूद के ढेर’ पर बैठते हैं ताकि उनके बच्चों का पेट भर सके।
अपनों का इंतजार: कारखाने के बाहर बिलखती उन मांओं और पत्नियों को देखिए, जो मलबे में अपनों को तलाश रही हैं।
सपनों की राख: मरने वालों में कई युवा थे, जो अपने घर की इकलौती उम्मीद थे। आज उस बारूद ने न सिर्फ शरीर जलाए, बल्कि कई चूल्हे भी हमेशा के लिए ठंडे कर दिए।
प्रशासनिक सुस्ती और उठते सवाल
हादसे के बाद प्रशासन की टीमें और फायर ब्रिगेड मौके पर तो पहुँचीं, लेकिन सवाल वही पुराना है— क्या सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई।
क्या कारखाने में विस्फोटक रखने के नियमों का पालन हो रहा था।
क्या मजदूरों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण दिए गए थे?
क्या प्रशासन केवल मुआवजे का ऐलान करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगा।
मुख्यमंत्री कार्यालय ने घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया है और उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। स्थानीय अस्पतालों में घायलों के लिए इमरजेंसी वार्ड बनाए गए हैं। हालांकि, मलबे के नीचे अभी भी कुछ लोगों के दबे होने की आशंका है, जिसके कारण रेस्क्यू ऑपरेशन पूरी रात जारी रहने की संभावना है।
आज नागपुर रो रहा है। यह चीखें उन व्यवस्थाओं से सवाल पूछ रही हैं जो विकास की चमक में इन मजदूरों के पसीने और जान की कीमत भूल जाती हैं। मुआवजा शायद जख्मों पर मरहम लगा दे, लेकिन उन खाली हुई कुर्सियों को कभी नहीं भर पाएगा।



