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डिजिटल इंडिया का काला सच: ₹19,000 के लिए बहन की अस्थियां लेकर बैंक की चौखट पर पहुँचा बेबस आदिवासी

बहन की अस्थियां लेकर बैंक की चौखट पर पहुँचा बेबस आदिवासी

।ओडिशा (इंद्र यादव) क्योंझर,भारत भले ही दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दम भरता हो और डिजिटल इंडिया का नारा बुलंद करता हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है। ओडिशा के क्योंझर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पूरी मानवता और हमारी प्रशासनिक व्यवस्था को शर्मसार कर दिया है।क्या है पूरा मामलाएक गरीब आदिवासी युवक, जीतू मुंडा, पिछले दो महीनों से सरकारी दफ्तरों और बैंक के चक्कर काट-काट कर थक चुका था। उसकी बहन की दो महीने पहले मृत्यु हो गई थी। बहन के बैंक खाते में 19,300 रुपये जमा थे। एक गरीब परिवार के लिए यह रकम कितनी बड़ी होती है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जीतू को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए इन पैसों की सख्त दरकार थी।नियमों की दीवार और टूटती उम्मीदेंजीतू जब भी बैंक जाता, उसे बैंक कर्मियों द्वारा एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता— “पैसे चाहिए तो खाताधारक (बहन) को खुद आना होगा और साइन करने होंगे।” जीतू ने बार-बार चीख-चीख कर कहा कि उसकी बहन अब इस दुनिया में नहीं है, वह मर चुकी है। लेकिन बैंक के ‘कागजी शेरों’ के दिल नहीं पसीजे। उन्होंने मौत के प्रमाण से ज्यादा फिजिकल उपस्थिति को तरजीह दी। सिस्टम के जटिल नियमों ने एक गरीब भाई की सच्चाई पर विश्वास करने के बजाय उसे दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया।कंकाल लेकर बैंक पहुंचा बेबस भाईजब हताशा और मजबूरी अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई, तो जीतू मुंडा ने वह किया जिसे सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाएं। अपनी सच्चाई साबित करने के लिए वह अपनी मृत बहन के कंकाल (हड्डियों के अवशेष) को एक झोले में भरकर बैंक पहुँच गया। वह समाज और सिस्टम को यह दिखाना चाहता था कि जिस ‘खाताधारक’ को वे ढूंढ रहे हैं, वह अब केवल अस्थियों का ढेर है।यह दृश्य केवल एक व्यक्ति की बेबसी नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की सड़ चुकी संवेदनशीलता का प्रमाण है।तीखे सवाल: किसके लिए है यह सिस्टमनियम या मौत का फंदा? क्या नियम इंसानों की सहूलियत के लिए होते हैं या उन्हें प्रताड़ित करने के लिए? क्या एक आदिवासी युवक की बात का कोई मोल नहीं था?गरीब के लिए अलग तराजू? बड़े-बड़े घोटालेबाजों के लिए बैंक के दरवाजे और नियम रातों-रात बदल जाते हैं, लेकिन एक गरीब को अपनी ही जमापूंजी के लिए हड्डियां क्यों ढोनी पड़ रही हैं?विकास का खोखला दावा? हम चांद पर पहुँच रहे हैं, लेकिन क्या हम अपने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक “संवेदना” पहुँचा पाए हैं?परिणामजीतू मुंडा की यह कहानी आज के भारत का एक काला सच है। यह घटना केवल बैंक की लापरवाही नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की हार है जहाँ कागजों को इंसान की तकलीफ से बड़ा माना जाता है। अगर आज भी एक इंसान को अपनी बात साबित करने के लिए अपनों की हड्डियां कंधे पर ढोनी पड़ रही हैं, तो यकीन मानिए, हमारा सिस्टम वेंटिलेटर पर है।सवाल अब भी वही है— क्या इस अपमान और मानसिक प्रताड़ना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होगी।या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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