Homeआज की ताजा खबरमानवाधिकार आयोग पहुँचा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मामला.DGP से मांगी गई रिपोर्ट !

मानवाधिकार आयोग पहुँचा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मामला.DGP से मांगी गई रिपोर्ट !

मुंबई (इंद्र यादव) प्रयागराज,ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ उत्तर प्रदेश में दर्ज हुई एफआईआर अब गले की फांस बनती नजर आ रही है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस मामले में औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज कर ली है (डायरी नंबर: 4177/IN/2026)। ‘डीके फाउंडेशन ऑफ फ्रीडम एंड जस्टिस’ द्वारा दाखिल इस याचिका ने यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सत्ता का दुरुपयोग या साजिश!
आयोग को सौंपी गई शिकायत में सीधा आरोप लगाया गया है कि स्वामी जी के विरुद्ध की गई कार्रवाई ‘सत्ता का नग्न प्रदर्शन’ और ‘एब्यूज ऑफ पावर’ है। याचिका के अनुसार, प्रयागराज के झुंसी थाने में दर्ज यह एफआईआर पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण है।


शिकायत के मुख्य बिंदु!
मौलिक अधिकारों का हनन: अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 25-28 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया गया है।
बिना जांच की गई कार्रवाई: आरोप है कि एक आध्यात्मिक गुरु की छवि धूमिल करने के लिए बिना किसी ठोस साक्ष्य के गंभीर धाराओं (पॉक्सो एक्ट और बीएनएस की धारा 351(3)) में मुकदमा दर्ज किया गया।
DGP से जवाबदेही की मांग: याचिका में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) से इस मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब करने की मांग की गई है।
शिकायतकर्ता का ‘काला चिट्ठा’ आयोग के सामने !
इस मामले में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब संस्था ने स्वामी जी के खिलाफ शिकायत करने वाले व्यक्ति (वादी) की ही हिस्ट्रीशीट आयोग को सौंप दी।

“एक ऐसा व्यक्ति जो खुद आपराधिक प्रवृत्ति का है और जिसका लंबा आपराधिक इतिहास रहा है, उसकी तहरीर पर बिना प्रारंभिक जांच के एक शंकराचार्य पर मुकदमा दर्ज करना पुलिस की मंशा पर संदेह पैदा करता है।” – डीके फाउंडेशन

संस्था ने वादी के आपराधिक इतिहास की प्रमाणित प्रतियां साक्ष्य के रूप में संलग्न की हैं, जिससे अब पुलिस बैकफुट पर नजर आ रही है।
क्या गिर सकती है अधिकारियों पर गाज !
NHRC द्वारा इस मामले को संज्ञान में लेने के बाद अब राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। यदि यह साबित होता है कि एफआईआर केवल व्यक्तिगत द्वेष या राजनीतिक दबाव में की गई थी, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के तहत कड़ी कार्रवाई हो सकती है।
आगे की राह!
अब सबकी नजरें NHRC के अगले कदम और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पेश की जाने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं। क्या यह “किसी को बर्बाद करने की नीयत से झूठा मुकदमा ठोकना”
का मामला बनेगा! वक्त बताएगा।

  • इंद्र यादव/ईशान टाइम्स,मुंबई
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